AK-47 और पैलेट गन के इस्तेमाल पर केंद्र और राज्य की BJP सरकार को लताड़ ,शांतिपूर्ण विरोध करना भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है-सुप्रीम कोर्ट

शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और केवल आंदोलन होने के आधार पर पुलिस की बर्बरता या लाठीचार्ज को सही नहीं ठहराया जा सकता। यह सख्त टिप्पणी भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 20 जुलाई 2026 को नीट (NEET) पेपर लीक मामले में छात्रों के ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की।मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में पुलिस के रवैए पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा सहित कई अन्य याचिकाकर्ताओं ने अदालत में सुरक्षा बलों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग (यहाँ तक कि बिहार में AK-47 के कथित इस्तेमाल) का मुद्दा उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत शांतिपूर्ण और कानूनसम्मत विरोध प्रदर्शन करने की पूरी गारंटी है। इस अधिकार को किसी भी स्थिति में नागरिकों से छीना नहीं जा सकता।पुलिस बर्बरता पर सवाल: पीठ ने कहा कि “सिर्फ इसलिए कि कहीं कोई आंदोलन हो रहा है, पुलिस की अत्यधिक सख्ती या लाठीचार्ज को जायज नहीं ठहराया जा सकता”।समान पुलिस प्रोटोकॉल की जरूरत: सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अब समय आ गया है जब प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए पूरे देश में एक समान पुलिस प्रोटोकॉल होना चाहिए। कोर्ट इस संबंध में जल्द ही दिशानिर्देश जारी कर सकता है।
अदालत ने कहा कि अगर पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया है, तो उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।सुरक्षा बलों पर हमले भी चिंताजनक: कोर्ट ने यह भी साफ किया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमले होना और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना भी उतनी ही चिंता की बात है। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए प्रदर्शनकारियों में भी ‘आत्म-अनुशासित आचरण’ होना अनिवार्य है।


