जानें विटामिन डी के फायदे और इसके स्रोत ,विटामिन डी पर प्रमाणित प्राकृतिक चिकित्सक प्रीती खत्री का लेख !
जानें विटामिन डी के फायदे और इसके स्रोत ,विटामिन डी पर प्रमाणित प्राकृतिक चिकित्सक प्रीती खत्री का लेख !
विटामिन डी कैसे बनता है, स्रोत, फायदे, समस्या, नार्मल स्तर
विटामिन डी वसा-घुलनशील प्रो-हार्मोन का एक समूह होता है। इसके दो प्रमुख रूप हैं: विटामिन डी२ (या अर्गोकेलसीफेरोल) एवं विटामिन डी३ (या कोलेकेलसीफेरोल). सूर्य के प्रकाश, खाद्य एवं अन्य पूरकों से प्राप्त विटामिन डी निष्क्रीय होता है। इसे शरीर में सक्रिय होने के लिये कम से कम दो हाईड्रॉक्सिलेशन अभिक्रियाएं वांछित होती हैं। शरीर में मिलने वाला कैल्सीट्राईऑल विटामिन डी का सक्रिय रूप होता है।
त्वचा जब धूप के संपर्क में आती है तो शरीर में विटामिन डी निर्माण की प्रक्रिया आरंभ होती है। यह मछलियों में भी पाया जाता है। विटामिन डी की मदद से कैल्शियम को शरीर में बनाए रखने में मदद मिलती है जो हड्डियों की मजबूती के लिए अत्यावश्यक होता है। इसके अभाव में हड्डी कमजोर होती हैं व टूट भी सकती हैं।[ छोटे बच्चों में यह स्थिति रिकेट्स कहलाती है और व्यस्कों में हड्डी के मुलायम होने को ओस्टीयोमलेशिया कहते हैं।
इसके अलावा, हड्डी के पतला और कमजोर होने को ओस्टीयोपोरोसिस कहते हैं। इसके अलावा विटामिन डी कैंसर, क्षय रोग जैसे रोगों से भी बचाव करता है। इसलिए विटामिन डी को ‘सनशाइन विटामिन’ कहते हैं जिसकी पूर्ति सूर्य की रोशनी से हो सकती है।

डेनमार्क के शोधकर्ताओं के अनुसार विटामिन डी शरीर की टी-कोशिकाओं की क्रियाविधि में वृद्धि करता है, जो किसी भी बाहरी संक्रमण से शरीर की रक्षा करती हैं। इसकी मानव प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मुख्य भूमिका होती है और इसकी पर्याप्त मात्रा के बिना प्रतिरक्षा प्रणालीकी टी-कोशिकाएं बाहरी संक्रमण पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहती हैं। टी-कोशिकाएं सक्रिय होने के लिए विटामिन डी पर निर्भर रहती हैं। जब भी किसी टी-कोशिका का किसी बाहरी संक्रमण से सामना होता है, यह विटामिन डी की उपलब्धता के लिए एक संकेत भेजती है। इसलिये टी-कोशिकाओं को सक्रिय होने के लिए भी विटामिन डी आवश्यक होता है। यदि इन कोशिकाओं को रक्त में पर्याप्त विटामिन डी नहीं मिलता, तो वे चलना भी शुरू नहीं करतीं हैं।
अधिकता: विटामिन डी की अधिकता से शरीर के विभिन्न अंगों, जैसे गुर्दों में, हृदय में, रक्त रक्त वाहिकाओं में और अन्य स्थानों पर, एक प्रकार की पथरी उत्पन्न हो सकती है। ये विटामिन कैल्शियम का बना होता है, अतः इसके द्वारा पथरी भी बन सकती है। इससे रक्तचाप बढ सकता है, रक्त में कोलेस्टेरॉल बढ़ सकता है और हृदय पर प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही चक्कर आना, कमजोरी लगना और सिरदर्द, आदि भी हो सकता है। पेट खराब होने से दस्त भी हो सकता है।
विटामिन डी: विटामिन डी2 और विटामिन डी3 में अंतर
विटामिन डी, दो प्रकार के होते हैं, जो विटामिन डी2 (Vitamin D2) और विटामिन डी3 (Vitamin D3) के नाम से जाना जाता है। शरीर को विटामिन डी2 (Vitamin D2) और विटामिन डी3 (Vitamin D3) दोनों की जरूरत होती है और दोनों मिलकर विटामिन डी की जरूरत को पूरा करते हैं। विटामिन डी3 और विटामिन डी2 के गुण एक दूसरे से कुछ मायनों में अलग हैं। जैसा कि पहले ही बताया गया है कि विटामिन डी वसा घुलनशील विटामिन होता है जो दो विटामिन डी2 (अर्गोंकैल्सिफेरॉल) और विटामिन डी3 (कॉलेकैल्सिफेरॉल) से मिलकर बना होता है। लेकिन दोनों का स्रोत एक दूसरे से बिल्कुल अलग होता है। विटामिन डी3 पशुओं से मिलता है, जैसे- मछली, फिश ऑयल, अंडे की जर्दी, मक्खन और डायटरी सप्लीमेंट्स तो डी2 पौधों से जैसे- मशरूम (लेकिन जो धूप में उगे हुए होते हैं) और फॉर्टिफाइड फूड्स से मिलता है।
विटामिन डी का प्रमुख स्रोत
विटामिन डी का प्रमुख स्रोत सूरज की किरणें हैं, जिसमें अल्ट्रावायलट बी (यूवीबी) होता है। वह त्वचा में 7-डिहाइड्रोकोलेस्टेरॉल यौगिक के साथ संयोजन करके विटामिन डी3 बनाने का काम करता है। इसी तरह की प्रक्रिया पौधों और मशरूम से होती है। यहां भी अल्ट्रावायलट किरणें पौधों में मौजूद तेल के यौगिक के साथ मिलकर विटामिन डी2 बनाते है।
आपके शरीर को मिल रहे विटामिन डी2 और विटामिन डी3 को लीवर चयापचय प्रक्रिया द्वारा कैल्सिफेडॉल में बदलने का काम करता है। लीवर चयापचय के प्रक्रिया द्वारा विटामिन डी2 को 25-हाइड्रोक्सीविटामिन डी2 और विटामिन डी3 को 25-हाइड्रोक्सीविटामिन डी3 में बदल देता है। शोध के अनुसार इस प्रक्रिया के दौरान दोनों का उत्पादन भिन्न-भिन्न मात्रा में होता है, जिसके यौगिक को कैल्सिफेडॉल कहते हैं। कैल्सिफेडॉल रक्त में इसके स्तर से पता चलता है कि शरीर में इसकी मात्रा कितनी है।