अमित शाह मुर्दाबाद बीजेपी सरकार मुर्दाबाद जैसे नारे लगा विरोध करना जनता का संवैधानिक अधिकार,”नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है? यह सब क्या है?” – जस्टिस जमदार

बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस माधव जामदार ने स्पष्ट किया है कि सरकार की नीतियों का शांतिपूर्ण विरोध करना और “बीजेपी सरकार मुर्दाबाद” या “अमित शाह मुर्दाबाद” जैसे राजनीतिक नारे लगाना नागरिकों का मौलिक और संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने यह टिप्पणी सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के नेता सईद अहमद की जिला-बदर (तड़ीपार) कार्रवाई को रद्द करते हुए की।
"All citizens are being made slaves of Indian Government. They cannot stage protests, they cannot agitate-What is all this? Now so many papers have been leaked. If people protest, you will slap cases… What is this? It is the right of the citizens to protest.
The petitioner has… pic.twitter.com/xNa1UrTHot
— Live Law (@LiveLawIndia) July 2, 2026
कोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को सरकार के फैसलों का शांतिपूर्ण विरोध करने का पूरा हक है। सरकार का विरोध करने मात्र से किसी को अधिकारहीन नहीं किया जा सकता।गुलाम नहीं हैं नागरिक: जस्टिस जामदार ने मौखिक टिप्पणी करते हुए तीखे शब्दों में कहा, “सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है? वे विरोध नहीं कर सकते, आंदोलन नहीं कर सकते–यह सब क्या है?”
अदालत ने पुलिस की भूमिका पर सख्त लहजे में कहा कि पुलिस मुख्यमंत्री या मंत्रियों की नौकर नहीं है, बल्कि वे जनता के सेवक (पब्लिक सर्वेंट) हैं।नारेबाजी तड़ीपारी का आधार नहीं: कोर्ट ने यह साफ किया कि राजनीतिक नारे लगाने के आधार पर किसी भी नागरिक के खिलाफ महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत ‘तड़ीपार’ (externment) जैसी असाधारण और कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती।
यह पूरा मामला SDPI के महासचिव सईद अहमद से जुड़ा है, जिन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और ज्ञानवापी विवाद सहित केंद्र सरकार के कई फैसलों के खिलाफ आंदोलन आयोजित किए थे। मुंबई पुलिस ने उनके खिलाफ कुछ एफआईआर दर्ज होने के बाद, दिसंबर 2025 में उन्हें एक साल के लिए मुंबई और आस-पास के जिलों से तड़ीपार (शहर से बाहर) करने का आदेश दिया था।सईद अहमद ने पुलिस के इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस माधव जामदार की पीठ ने पुलिस की इस कार्रवाई को नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान से जीने के अधिकार का हनन माना और तड़ीपार के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया।



